न्यूज़डे नेटवर्क डेस्क:- हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों पर अब सूखे चीड़ के पेड़ केवल ‘खड़े मलबे’ बनकर नहीं रहेंगे। राज्य सरकार ने एक साहसी कदम उठाते हुए उन जटिल कानूनी बेड़ियों को तोड़ दिया है, जो दशकों से किसानों और वन विभाग के हाथ बांधे हुए थीं। अब लालफीताशाही की जगह ‘ग्रीन सिग्नल’ को प्राथमिकता दी गई है।
क्या है नया फैसला?
हिमाचल सरकार ने दशकों पुराने 10 वर्षीय कटान कार्यक्रम की अनिवार्य शर्त को सूखे चीड़ के पेड़ों के लिए समाप्त कर दिया है। अब इन पेड़ों को काटने की प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत कर दिया गया है, जिससे स्थानीय स्तर पर ही निर्णय लिए जा सकेंगे।
DFO और DCF स्तर पर: अब ये अधिकारी अपने स्तर पर साल भर में 500 सूखे पेड़ों को काटने की हरी झंडी दे सकते हैं।
वन संरक्षक (Conservator) का रोल: असाधारण परिस्थितियों में, वन संरक्षक पूरे सर्कल में प्रतिवर्ष अधिकतम 500 अतिरिक्त पेड़ों की सिफारिश कर सकेंगे। मंजूरी से पहले उप वन संरक्षक या मंडल अधिकारी को मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन (Physical Verification) करना होगा, ताकि नियमों का दुरुपयोग न हो।
क्यों पड़ी इस बदलाव की जरूरत? सरकार का यह कदम केवल लकड़ी काटने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई दूरगामी लक्ष्य हैं। सूखे चीड़ के पेड़ और उनकी पत्तियां जंगलों में आग (Forest Fire) का सबसे बड़ा कारण बनती हैं। इन्हें हटाने से जंगलों को खाक होने से बचाया जा सकेगा। खेतों के किनारे खड़े सूखे पेड़ किसानों के लिए खतरा और बाधा दोनों थे। अब उन्हें शोषण से मुक्ति मिलेगी। जब वैध तरीके आसान होंगे, तो चोरी-छिपे कटान की प्रवृत्ति में कमी आएगी। बीमार और कीटग्रस्त पेड़ों को हटाकर नए और स्वस्थ पौधों के पनपने के लिए जगह बनाई जाएगी।
महत्वपूर्ण तथ्य और दायरा: यह अधिसूचना अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) केके पंत द्वारा जारी की गई है, जो हिमाचल प्रदेश भू-परिरक्षण अधिनियम, 1978 के तहत मिली शक्तियों पर आधारित है।


