Sunday, March 1, 2026

गिरीपार का माघी त्योहार: एक ही दिन में दी जाएगी करोड़ो रुपए के हज़ारो बकरो की बलि

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सिरमौर, 10 जनवरी (न्यूज़डे नेटवर्क ): सिरमौर जिले के गिरीपार क्षेत्र में मनाया जाने वाला माघी पर्व क्षेत्र की हाटी समुदाय की एक विशिष्ट और पारंपरिक पहचान है। यह पर्व 28 गते पौष 11 जनवरी को बड़े स्तर पर मनाया जाता है। माघी को गिरीपार में ‘भातियोज’ और ‘खोड़ा’ पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। यह न केवल सामाजिक महत्व रखता है, बल्कि अपनी अनोखी परंपराओं और सामूहिक सहभागिता के लिए भी प्रसिद्ध है। माघी पर्व को गिरीपार का सबसे खर्चीला और बड़ा त्योहार माना जाता है। इस दिन क्षेत्र में एक ही दिन में हजारों की संख्या में बकरे, सुअर और खाड्डू (भेड़) काटे जाते हैं, जिनकी कीमत करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है। काटे गए पशुओं का मांस पूरे महीने रिश्तेदारों और मेहमानों की खातिरदारी में परोसा जाता है। इस अवसर पर दूर-दराज से परिजन वह रिश्तेदार अपने गांव पहुंचते हैं और सामाजिक मेल-जोल को मजबूत करते हैं। हाटी समुदाय में माघी पर्व से जुड़ी कई विशेष परंपराएं हैं। शादीशुदा बेटियों को हर वर्ष माघी का हिस्सा दिया जाता है। जब तक ससुराल में बेटी के लिए गुड़ की भेली के रूप में त्योहार का हिस्सा नहीं पहुंचाया जाता, तब तक वह अपने मायके नहीं आती। इसके अलावा, यदि वर्ष भर के भीतर किसी परिवार में मृत्यु हुई हो तो माघी के दिन सबसे पहले पूरे गांव के लोग उस परिवार के यहां बकरा काटकर सामाजिक सहयोग और संवेदना प्रकट करते हैं।

माघी पर्व की शुरुआत कब और कैसे हुई, इस बारे में कोई लिखित या ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसको लेकर लोगों के बीच अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि पुराने समय में लोग बड़ी संख्या में भेड़-बकरियों का पालन करते थे। जनवरी में बर्फबारी के कारण पहाड़ी क्षेत्रों में आवाजाही बंद हो जाती थी, इसलिए लोग बकरे काटकर पूरे महीने घर में रहकर मांस का उपयोग करते थे, वहीं से यह परंपरा शुरू हुई। कुछ अन्य लोगों का मत है कि प्राचीन काल में राक्षसों से रक्षा और काली माता को प्रसन्न करने के लिए बलि प्रथा की शुरुआत की गई थी।

हालांकि वर्तमान समय में इस परंपरा को लेकर जागरूकता बढ़ी है। बड़ी संख्या में लोग शाकाहार को अपना रहे हैं और पंडितों,विद्वानों व सामाजिक संगठनों द्वारा भी पशु बलि जैसी प्रथाओं को छोड़ने की अपील की जा चुकी है। इसके बावजूद माघी पर्व आज भी गिरीपार क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के रूप में पूरी हर्षों उत्साह के साथ मनाया जाता है।

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